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mahabharat 1.66.42: भृगु के विद्वान पुत्र कवि हुए और कवि के पुत्र शुक्राचार्य हुए, जो ग्रह होकर तीनों लोकों के जीवन की रक्षा के लिए वर्षा, अनावृष्टि तथा भय और असुरक्षा उत्पन्न करते हैं। स्वयंभू ब्रह्माजी की प्रेरणा से वे समस्त लोकों में विचरण करते रहते हैं। 42॥   |   mahabharat अध्याय 1.66: महर्षियों तथा कश्यप-पत्नियोंकी संतान-परम्पराका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 66: महर्षियों तथा कश्यप-पत्नियोंकी संतान-परम्पराका वर्णन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  1.66.42 
भृगो: पुत्र: कविर्विद्वाञ्छुक्र: कविसुतो ग्रह:।
त्रैलोक्यप्राणयात्रार्थं वर्षावर्षे भयाभये।
स्वयम्भुवा नियुक्त: सन् भुवनं परिधावति॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
भृगु के विद्वान पुत्र कवि हुए और कवि के पुत्र शुक्राचार्य हुए, जो ग्रह होकर तीनों लोकों के जीवन की रक्षा के लिए वर्षा, अनावृष्टि तथा भय और असुरक्षा उत्पन्न करते हैं। स्वयंभू ब्रह्माजी की प्रेरणा से वे समस्त लोकों में विचरण करते रहते हैं। 42॥
 
Bhrigu's learned son became a poet and the poet's son became Shukracharya, who, being a planet, creates rain, drought and fear and insecurity to protect the life of the three worlds. With the inspiration of Swayambhu Brahmaji, he keeps roaming around all the worlds. 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)