श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 66: महर्षियों तथा कश्यप-पत्नियोंकी संतान-परम्पराका वर्णन  »  श्लोक 35-36
 
 
श्लोक  1.66.35-36 
त्वाष्ट्री तु सवितुर्भार्या वडवारूपधारिणी।
असूयत महाभागा सान्तरिक्षेऽश्विनावुभौ॥ ३५॥
द्वादशैवादिते: पुत्रा: शक्रमुख्या नराधिप।
तेषामवरजो विष्णुर्यत्र लोका: प्रतिष्ठिता:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
त्वष्टा की पुत्री संज्ञा भगवान सूर्य की पत्नी हैं। वे परम सौभाग्यवती हैं। उन्होंने अश्विनी (घोड़ी) का रूप धारण करके आकाश में दोनों अश्विनीकुमारों को जन्म दिया। हे राजन! इंद्र सहित अदिति के केवल बारह पुत्र हैं। उनमें भगवान विष्णु सबसे छोटे हैं, जिनमें ये समस्त लोक स्थित हैं। ॥35-36॥
 
Tvashta's daughter Sanjna is the wife of Lord Surya. She is extremely fortunate. She assumed the form of Ashwini (mare) and gave birth to both Ashwinikumars in the sky. O King! Aditi has only twelve sons including Indra. Among them Lord Vishnu is the youngest, in whom all these worlds are established. ॥35-36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)