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mahabharat 1.65.29-30: एकाक्ष, वीरमृत्पा, प्रलम्ब, नरक, वातापि, शत्रु, महादैत्य शठ, गविष्ठ, वनायु और दीर्घजीभ राक्षस। भारतवर्ष। इन सबके पुत्र और पौत्र असंख्य कहे गए हैं। 29-30॥   |   mahabharat अध्याय 1.65: मरीचि आदि महर्षियों तथा अदिति आदि दक्षकन्याओंके वंशका विवरण   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 65: मरीचि आदि महर्षियों तथा अदिति आदि दक्षकन्याओंके वंशका विवरण  »  श्लोक 29-30
 
 
श्लोक  1.65.29-30 
एकाक्षो मृतपा वीर: प्रलम्बनरकावपि।
वातापी शत्रुतपन: शठश्चैव महासुर:॥ २९॥
गविष्ठश्च वनायुश्च दीर्घजिह्वश्च दानव:।
असंख्येया: स्मृतास्तेषां पुत्रा: पौत्राश्च भारत॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
एकाक्ष, वीरमृत्पा, प्रलम्ब, नरक, वातापि, शत्रु, महादैत्य शठ, गविष्ठ, वनायु और दीर्घजीभ राक्षस। भारतवर्ष। इन सबके पुत्र और पौत्र असंख्य कहे गए हैं। 29-30॥
 
Ekaksh, Veer Mritpa, Pralamb, Narak, Vatapi, Enmity, great demon Shath, Gavishtha, Vanayu and demon Long tongue. India The sons and grandsons of all of them are said to be innumerable. 29-30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)