श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 64: ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियवंशकी उत्पत्ति और वृद्धि तथा उस समयके धार्मिक राज्यका वर्णन; असुरोंका जन्म और उनके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना तथा ब्रह्माजीका देवताओंको अपने अंशसे पृथ्वीपर जन्म लेनेका आदेश  »  श्लोक 38-40
 
 
श्लोक  1.64.38-40 
न ह्यमी भूतसत्त्वौघा: पन्नगा: सनगां महीम्।
तदा धारयितुं शेकु: संक्रान्तां दानवैर्बलात्॥ ३८॥
ततो मही महीपाल भारार्ता भयपीडिता।
जगाम शरणं देवं सर्वभूतपितामहम्॥ ३९॥
सा संवृतं महाभागैर्देवद्विजमहर्षिभि:।
ददर्श देवं ब्रह्माणं लोककर्तारमव्ययम्॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
उस समय कच्छप, दैत्य आदि दैत्यों और शेषनाग की सम्मिलित शक्तियाँ भी उस पृथ्वी को धारण करने में समर्थ नहीं थीं जिसे दैत्यों ने बलपूर्वक पर्वतों और वृक्षों सहित छीन लिया था। महीपाल! तब दैत्यों के भार से दबी हुई और भय से पीड़ित पृथ्वी सम्पूर्ण भूतों के पितामह भगवान ब्रह्मा की शरण में आ गई। ब्रह्मलोक में जाकर पृथ्वी ने जगत के अविनाशी रचयिता भगवान ब्रह्मा को देखा, जो महाभाग देवताओं, द्विजों और महर्षियों से घिरे हुए थे। 38-40॥
 
At that time, the combined powers of tortoises, giants etc. and even Sheshnag were not able to hold the earth which the demons had forcefully captured, along with the mountains and trees. Mahipal! Then the earth, overwhelmed by the burden of demons and suffering from fear, came under the protection of Lord Brahma, the grandfather of all the ghosts. After going to Brahmalok, the earth saw Lord Brahma, the immortal creator of the world, who was surrounded by Mahabhag gods, Dwijas and Maharishis. 38-40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)