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mahabharat 1.63.95: 'मैंने असंख्य हजार बार तप किया है। फिर उस तप से मेरा छोटा-सा पाप क्यों नष्ट नहीं हुआ? ब्राह्मण का वध समस्त प्राणियों के वध से भी बढ़कर है॥ 95॥   |   mahabharat अध्याय 1.63: राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 63: राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  1.63.95 
तन्मे सहस्रममितं कस्मान्नेहाजयत् तप:।
गरीयान् ब्राह्मणवध: सर्वभूतवधाद् यत:॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
'मैंने असंख्य हजार बार तप किया है। फिर उस तप से मेरा छोटा-सा पाप क्यों नष्ट नहीं हुआ? ब्राह्मण का वध समस्त प्राणियों के वध से भी बढ़कर है॥ 95॥
 
'I have performed penance innumerable thousand times. Then why did that penance not destroy my small sin? Killing a Brahmin is greater than killing all living beings.॥ 95॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)