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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 63: राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा  »  श्लोक 87-88
 
 
श्लोक  1.63.87-88 
पादापसारिणं धर्मं स तु विद्वान् युगे युगे।
आयु: शक्तिं च मर्त्यानां युगावस्थामवेक्ष्य च॥ ८७॥
ब्रह्मणो ब्राह्मणानां च तथानुग्रहकाङ्क्षया।
विव्यास वेदान् यस्मात् स तस्माद् व्यास इति स्मृत:॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
विद्वान द्वैपायन ने देखा कि प्रत्येक युग में धर्म का एक अंश लुप्त होता जा रहा है। मनुष्यों की आयु और बल क्षीण हो गए हैं तथा आयु अत्यंत निकृष्ट हो गई है। यह सब देखकर और सुनकर उन्होंने वेदों और ब्राह्मणों पर कृपा करने की इच्छा से वेदों का विस्तार किया। इसीलिए वे व्यास नाम से प्रसिद्ध हुए। 87-88।
 
The learned Dwaipayana saw that in every age one part of Dharma is vanishing. The lifespan and strength of humans have diminished and the age has become so bad. After seeing and hearing all this, he expanded the Vedas with the desire to bestow grace on the Vedas and Brahmins. That is why he became famous by the name of Vyasa. 87-88.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)