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mahabharat 1.63.51-52: उन्होंने सोचा, ‘मेरा वीर्य नष्ट न हो और मेरी पत्नी गिरिका का मासिक धर्म भी नष्ट न हो।’ ऐसा बार-बार विचार करके राजाओं में श्रेष्ठ वसु ने उस वीर्य को अमोघ बनाने का निश्चय किया ॥51-52॥   |   mahabharat अध्याय 1.63: राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 63: राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा  »  श्लोक 51-52
 
 
श्लोक  1.63.51-52 
इदं मिथ्या परिस्कन्नं रेतो मे न भवेदिति।
ऋतुश्च तस्या: पत्न्या मे न मोघ: स्यादिति प्रभु:॥ ५१॥
संचिन्त्यैवं तदा राजा विचार्य च पुन: पुन:।
अमोघत्वं च विज्ञाय रेतसो राजसत्तम:॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने सोचा, ‘मेरा वीर्य नष्ट न हो और मेरी पत्नी गिरिका का मासिक धर्म भी नष्ट न हो।’ ऐसा बार-बार विचार करके राजाओं में श्रेष्ठ वसु ने उस वीर्य को अमोघ बनाने का निश्चय किया ॥51-52॥
 
He thought, 'My ejaculated semen should not go to waste, and also my wife Girika's menstrual period should not go to waste.' After thinking like this again and again, Vasu, the best of kings, decided to make that semen infallible. ॥ 51-52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)