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mahabharat 1.63.20-21: दूसरे दिन, अर्थात् नए संवत्सर के प्रथम दिन, छड़ी को वहाँ से निकालकर बहुत ऊँचे स्थान पर रखा जाता है; फिर उसे कपड़े की पेटी, चंदन, माला और आभूषणों से सजाया जाता है। विधिपूर्वक उस पर फूल और धागे की मालाएँ लपेटी जाती हैं। तत्पश्चात, उसी छड़ी पर हंस के रूप में देवेश्वर भगवान इंद्र की पूजा की जाती है।॥ 20-21॥   |   mahabharat अध्याय 1.63: राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 63: राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  1.63.20-21 
अपरेद्युस्ततस्तस्या: क्रियतेऽत्युच्छ्रयो नृपै:।
अलंकृताया: पिटकैर्गन्धमाल्यैश्च भूषणै:॥ २०॥
माल्यदामपरिक्षिप्ता विधिवत् क्रियतेऽपि च।
भगवान् पूज्यते चात्र हंसरूपेण चेश्वर:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
दूसरे दिन, अर्थात् नए संवत्सर के प्रथम दिन, छड़ी को वहाँ से निकालकर बहुत ऊँचे स्थान पर रखा जाता है; फिर उसे कपड़े की पेटी, चंदन, माला और आभूषणों से सजाया जाता है। विधिपूर्वक उस पर फूल और धागे की मालाएँ लपेटी जाती हैं। तत्पश्चात, उसी छड़ी पर हंस के रूप में देवेश्वर भगवान इंद्र की पूजा की जाती है।॥ 20-21॥
 
On the second day, that is, on the first day of the new Samvatsar, the stick is taken out from there and kept at a very high place; then it is decorated with a cloth box, sandalwood, garland and ornaments. Garlands of flowers and threads are wrapped around it as per the rituals. Thereafter, Deveshwar Lord Indra is worshipped in the form of a swan on the same stick.॥ 20-21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)