श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 63: राजा उपरिचरका चरित्र तथा सत्यवती, व्यासादि प्रमुख पात्रोंकी संक्षिप्त जन्मकथा  »  श्लोक 106
 
 
श्लोक  1.63.106 
भरद्वाजस्य च स्कन्नं द्रोण्यां शुक्रमवर्धत।
महर्षेरुग्रतपसस्तस्माद् द्रोणो व्यजायत॥ १०६॥
 
 
अनुवाद
एक समय घोर तपस्वी महर्षि भरद्वाज का वीर्य एक गर्त (पहाड़ की गुफा) में स्खलित हो गया और धीरे-धीरे बढ़ने लगा। उसी से द्रोण उत्पन्न हुए ॥106॥
 
Once, the semen of the fierce ascetic Maharishi Bharadwaj was ejaculated into a trough (mountain cave) and slowly started growing. From that, Drona was born.॥106॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)