श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 62:  »  श्लोक d4-d6h
 
 
श्लोक  1.62.d4-d6h 
(एष धर्म: पुरा दृष्ट: सर्वधर्मेषु भारत।
ब्राह्मणाच्छ्रवणं राजन् विशेषेण विधीयते॥
भूयो वा य: पठेन्नित्यं स गच्छेत् परमां गतिम्।
श्लोकं वाप्यनु गृह्णीत तथार्धश्लोकमेव वा॥
अपि पादं पठेन्नित्यं न च निर्भारतो भवेत्।)
 
 
अनुवाद
भारत! प्राचीन काल से ही सभी धर्मों में महाभारत का श्रवण करना सर्वश्रेष्ठ धर्म माना गया है। राजन्! इसे ब्राह्मण के मुख से सुनने का विशेष विधान है। जो मनुष्य इसका बार-बार या प्रतिदिन पाठ करता है, उसे परम मोक्ष की प्राप्ति होती है। चाहे कोई प्रतिदिन एक श्लोक, आधा श्लोक या श्लोक की एक पंक्ति का पाठ करे, तो भी उसे महाभारत के अध्ययन से कभी वंचित नहीं रहना चाहिए।
 
Bharat! Among all religions, listening to Mahabharata has been considered the best religion since ancient times. King! It is especially prescribed to listen to it from the mouth of a Brahmin. One who repeatedly or daily recites it, attains the ultimate salvation. Even if one recites one verse or half a verse or one line of a verse daily, one should never remain devoid of studying Mahabharata.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)