निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापै: प्रमुच्यते।
भरतानां यतश्चायमितिहासो महाद्भुत:॥ ४०॥
महतो ह्येनसो मर्त्यान् मोचयेदनुकीर्तित:।
त्रिभिर्वर्षैर्लब्धकाम: कृष्णद्वैपायनो मुनि:॥ ४१॥
नित्योत्थित: शुचि: शक्तो महाभारतमादित:।
तपो नियममास्थाय कृतमेतन्महर्षिणा॥ ४२॥
तस्मान्नियमसंयुक्तै: श्रोतव्यं ब्राह्मणैरिदम्।
कृष्णप्रोक्तामिमां पुण्यां भारतीमुत्तमां कथाम्॥ ४३॥
श्रावयिष्यन्ति ये विप्रा ये च श्रोष्यन्ति मानवा:।
सर्वथा वर्तमाना वै न ते शोच्या: कृताकृतै:॥ ४४॥
अनुवाद
जो मनुष्य इस महाभारत नामक निरुक्त (व्युत्पत्तिमूलक अर्थ) को जानता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। यह भरतवंशी क्षत्रियों का महान् एवं अद्भुत इतिहास है। अतः इसका निरन्तर पाठ करने से यह मनुष्यों को बड़े-बड़े पापों से मुक्त कर देता है। महाबली आप्तकाम मुनिवर श्री कृष्णद्वैपायन व्यासजी प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर और सायंकाल स्नानादि तथा शुद्धि के पश्चात महाभारत की रचना किया करते थे। महर्षि ने तप और नियम का आश्रय लेकर तीन वर्षों में इस ग्रन्थ को पूरा किया था। अतः ब्राह्मणों को भी नियम में स्थित होकर ही इस कथा का श्रवण करना चाहिए। जो ब्राह्मण श्री व्यासजी द्वारा कही गई इस पुण्यमयी उत्तम भारती कथा का श्रवण कराएँगे और जो मनुष्य इसे सुनेंगे, वे सब प्रकार के प्रयत्न करने पर भी इस बात के लिए शोक करने योग्य नहीं हैं कि उन्होंने अमुक कर्म क्यों किया और अमुक कर्म क्यों नहीं किया। 40-44॥
One who knows this Nirukta (etymological meaning) named Mahabharata becomes free from all sins. This is a great and wonderful history of Bharatvanshi Kshatriyas. Therefore, by continuously reciting it, it frees people from the biggest sins. The powerful Aaptakam Munivar Shri Krishnadvaipayan Vyasji used to compose Mahabharata every day after getting up early in the morning and after bathing and purifying himself in the evening. Maharishi completed this book in three years by taking recourse to penance and rules. Therefore, Brahmins should also listen to this story only after being established in the rules. The brahmins who will make one listen to this virtuous Uttam Bharati story told by Shri Vyasji and the people who will listen to it, despite making all kinds of efforts, they are not worthy of mourning for why they did a certain deed and why they did not do a certain deed. 40-44॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥