Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 1.61.32-37h: वहाँ पहुँचकर राजा धृतराष्ट्र और शान्तनुपुत्र भीष्म ने उनसे कहा, "महाराज! हमने यह निश्चय किया है कि आप खाण्डवप्रस्थ में ही रहें, जिससे आपको अपने कौरव भाइयों के साथ युद्ध करने का अवसर न मिले। वहाँ अनेक जनपद जुड़े हुए हैं। वहाँ सुन्दर विभाजनों वाली बड़ी-बड़ी सड़कें बनी हुई हैं। अतः आप ईर्ष्या छोड़कर खाण्डवप्रस्थ में जाकर रहें।" उनकी आज्ञा पाकर सभी पाण्डव अपने सभी मित्रों सहित, सब प्रकार के रत्नों से युक्त होकर खाण्डवप्रस्थ चले गए। कुन्तीपुत्रों ने वहाँ बहुत वर्षों तक निवास किया और अपने अस्त्र-शस्त्रों के बल से अन्य राजाओं को अपने अधीन कर लिया। इस प्रकार धर्म को महत्व देने वाले, सत्यव्रत का पालन करने में तत्पर, सदैव सावधान और सतर्क रहने वाले, क्षमाशील वीर पाण्डव अनेक शत्रुओं को कष्ट पहुँचाते हुए वहाँ रहने लगे।   |   mahabharat अध्याय 1.61: कौरव-पाण्डवोंमें फूट और युद्ध होनेके वृत्तान्तका सूत्ररूपमें निर्देश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 61: कौरव-पाण्डवोंमें फूट और युद्ध होनेके वृत्तान्तका सूत्ररूपमें निर्देश  »  श्लोक 32-37h
 
 
श्लोक  1.61.32-37h 
ते उक्ता धृतराष्ट्रेण राज्ञा शान्तनवेन च।
भ्रातृभिर्विग्रहस्तात कथं वो न भवेदिति॥ ३२॥
अस्माभि: खाण्डवप्रस्थे युष्मद्वासोऽनुचिन्तित:।
तस्माज्जनपदोपेतं सुविभक्तमहापथम्॥ ३३॥
वासाय खाण्डवप्रस्थं व्रजध्वं गतमत्सरा:।
तयोस्ते वचनाज्जग्मु: सह सर्वै: सुहृज्जनै:॥ ३४॥
नगरं खाण्डवप्रस्थं रत्नान्यादाय सर्वश:।
तत्र ते न्यवसन् पार्था: संवत्सरगणान् बहून्॥ ३५॥
वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान् महीभृत:।
एवं धर्मप्रधानास्ते सत्यव्रतपरायणा:॥ ३६॥
अप्रमत्तोत्थिता: क्षान्ता: प्रतपन्तोऽहितान् बहून्।
 
 
अनुवाद
वहाँ पहुँचकर राजा धृतराष्ट्र और शान्तनुपुत्र भीष्म ने उनसे कहा, "महाराज! हमने यह निश्चय किया है कि आप खाण्डवप्रस्थ में ही रहें, जिससे आपको अपने कौरव भाइयों के साथ युद्ध करने का अवसर न मिले। वहाँ अनेक जनपद जुड़े हुए हैं। वहाँ सुन्दर विभाजनों वाली बड़ी-बड़ी सड़कें बनी हुई हैं। अतः आप ईर्ष्या छोड़कर खाण्डवप्रस्थ में जाकर रहें।" उनकी आज्ञा पाकर सभी पाण्डव अपने सभी मित्रों सहित, सब प्रकार के रत्नों से युक्त होकर खाण्डवप्रस्थ चले गए। कुन्तीपुत्रों ने वहाँ बहुत वर्षों तक निवास किया और अपने अस्त्र-शस्त्रों के बल से अन्य राजाओं को अपने अधीन कर लिया। इस प्रकार धर्म को महत्व देने वाले, सत्यव्रत का पालन करने में तत्पर, सदैव सावधान और सतर्क रहने वाले, क्षमाशील वीर पाण्डव अनेक शत्रुओं को कष्ट पहुँचाते हुए वहाँ रहने लगे।
 
On reaching there, King Dhritarashtra and Shantanu's son Bhishma said to them, "Sir, we have decided that you should stay in Khandavprastha so that you do not get an opportunity to fight with your Kaurava brothers. Many districts are connected there. There are big roads built there with beautiful divisions. Therefore, you should leave jealousy and go to stay in Khandavprastha." On their orders, all the Pandavas, along with all their friends, carrying all kinds of gems, went to Khandavprastha. The sons of Kunti lived there for many years, subduing other kings with the might of their weapons. Thus, the brave Pandavas, who gave importance to religion, were ready to follow the vow of truth, were always cautious and vigilant, and were forgiving, and started living there, tormenting many enemies.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)