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mahabharat 1.61.1-2: वैशम्पायनजी बोले - राजन! मैं सर्वप्रथम एकाग्र मन से अपने गुरुदेव श्री व्यासजी महाराज को प्रणाम करता हूँ और समस्त द्विजों तथा अन्य विद्वानों को प्रणाम करता हुआ यहाँ संसार में प्रसिद्ध महर्षि एवं महात्मा परम बुद्धिमान व्यासजी के मत का पूर्णतः वर्णन करता हूँ।   |   mahabharat अध्याय 1.61: कौरव-पाण्डवोंमें फूट और युद्ध होनेके वृत्तान्तका सूत्ररूपमें निर्देश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 61: कौरव-पाण्डवोंमें फूट और युद्ध होनेके वृत्तान्तका सूत्ररूपमें निर्देश  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  1.61.1-2 
वैशम्पायन उवाच
गुरवे प्राङ्नमस्कृत्य मनोबुद्धिसमाधिभि:।
सम्पूज्य च द्विजान् सर्वांस्तथान्यान् विदुषो जनान्॥ १॥
महर्षेर्विश्रुतस्येह सर्वलोकेषु धीमत:।
प्रवक्ष्यामि मतं कृत्स्नं व्यासस्यास्य महात्मन:॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी बोले - राजन! मैं सर्वप्रथम एकाग्र मन से अपने गुरुदेव श्री व्यासजी महाराज को प्रणाम करता हूँ और समस्त द्विजों तथा अन्य विद्वानों को प्रणाम करता हुआ यहाँ संसार में प्रसिद्ध महर्षि एवं महात्मा परम बुद्धिमान व्यासजी के मत का पूर्णतः वर्णन करता हूँ।
 
Vaishampayanji said – King! First of all, with a concentrated mind, I bow down to my Gurudev Shri Vyasji Maharaj and while paying respect to all the Dwijas and other scholars, here I completely describe the opinion of the most intelligent Vyasji, a Maharishi and Mahatma famous throughout the world. 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)