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श्लोक 1.60.23-24  |
गुरोर्वचनमाज्ञाय स तु विप्रर्षभस्तदा।
आचचक्षे तत: सर्वमितिहासं पुरातनम्॥ २३॥
राज्ञे तस्मै सदस्येभ्य: पार्थिवेभ्यश्च सर्वश:।
भेदं सर्वविनाशं च कुरुपाण्डवयोस्तदा॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| उस समय गुरुदेव व्यासजी की यह आज्ञा पाकर विप्रवर वैशम्पायनजी राजा जनमेजय, सभासदों तथा अन्य समस्त भूपालों को कौरवों और पाण्डवों में किस प्रकार फूट पड़ी तथा उनका सर्वनाश हुआ, यह प्राचीन इतिहास सुनाने लगे॥23-24॥ |
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| At that time, after receiving this order from Gurudev Vyasji, Vipravar Vaishampayana started narrating to King Janamejaya, the councilors and all the other Bhupals, the ancient history of how there was a rift between the Kauravas and Pandavas and their annihilation. 23-24॥ |
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि कथानुबन्धे षष्टितमोऽध्याय:॥ ६०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें कथानुबन्धविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६०॥
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