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mahabharat 1.60.21: उग्रश्रवाजी कहते हैं - जनमेजय के ये वचन सुनकर पास ही बैठे हुए श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को इस प्रकार आदेश दिया।   |   mahabharat अध्याय 1.60: जनमेजयके यज्ञमें व्यासजीका आगमन, सत्कार तथा राजाकी प्रार्थनासे व्यासजीका वैशम्पायनजीसे महाभारत-कथा सुनानेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 60: जनमेजयके यज्ञमें व्यासजीका आगमन, सत्कार तथा राजाकी प्रार्थनासे व्यासजीका वैशम्पायनजीसे महाभारत-कथा सुनानेके लिये कहना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  1.60.21 
सौतिरुवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृष्णद्वैपायनस्तदा।
शशास शिष्यमासीनं वैशम्पायनमन्तिके॥ २१॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - जनमेजय के ये वचन सुनकर पास ही बैठे हुए श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को इस प्रकार आदेश दिया।
 
Ugrasravaji says - On hearing these words of Janamejaya, Sri Krishna Dwaipayana Vyasa who was sitting nearby, ordered his disciple Vaishmpayana in the following manner. 21.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)