श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 59: महाभारतका उपक्रम  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.59.8 
मन:सागरसम्भूतां महर्षेर्भावितात्मन:।
कथयस्व सतां श्रेष्ठ सर्वरत्नमयीमिमाम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
यह कथा शुद्ध हृदय वाले महर्षि वेदव्यास के हृदय सागर से निकले हुए सभी प्रकार के शुभ विचारों रूपी रत्नों से परिपूर्ण है। साधुशिरोमणि! आप मुझे यह कथा सुनाइए। 8॥
 
This story is full of gems in the form of all kinds of auspicious thoughts that emerged from the ocean of heart of Maharishi Veda Vyas, who had a pure heart. Sadhushiromane! You tell me this story. 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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