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mahabharat 1.59.6-7: शौनकजी बोले - सूतनंदन! महाभारत नामक इतिहास पाण्डवों की कीर्ति का विस्तार करने वाला है। सर्पयज्ञ के विविध कार्यों के बीच जब राजा जनमेजय अवकाश पाकर प्रश्न पूछते, तब श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यासजी उन्हें विधिपूर्वक महाभारत की कथा सुनाते। मैं उस पुण्यमयी कथा को विधिपूर्वक सुनना चाहता हूँ। 6-7॥   |   mahabharat अध्याय 1.59: महाभारतका उपक्रम   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 59: महाभारतका उपक्रम  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  1.59.6-7 
शौनक उवाच
महाभारतमाख्यानं पाण्डवानां यशस्करम्।
जनमेजयेन पृष्ट: सन् कृष्णद्वैपायनस्तदा॥ ६॥
श्रावयामास विधिवत् तदा कर्मान्तरे तु स:।
तामहं विधिवत् पुण्यां श्रोतुमिच्छामि वै कथाम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
शौनकजी बोले - सूतनंदन! महाभारत नामक इतिहास पाण्डवों की कीर्ति का विस्तार करने वाला है। सर्पयज्ञ के विविध कार्यों के बीच जब राजा जनमेजय अवकाश पाकर प्रश्न पूछते, तब श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यासजी उन्हें विधिपूर्वक महाभारत की कथा सुनाते। मैं उस पुण्यमयी कथा को विधिपूर्वक सुनना चाहता हूँ। 6-7॥
 
Shaunakji said – Sutanandan! The history called Mahabharata is going to expand the fame of Pandavas. When King Janamejaya would ask questions when he got a break between various activities of Sarpayagya, then Shri Krishna-Dwaipayan Vyasji would narrate the story of Mahabharata to him methodically. I want to listen to that virtuous story properly. 6-7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)