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mahabharat 1.58.6: तत्पश्चात् तक्षक दुःखी हृदय से आकाश में उसी प्रकार स्थिर खड़ा रहा, जैसे कोई मनुष्य आकाश और पृथ्वी के बीच लटका रहता है।   |   mahabharat अध्याय 1.58: यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 58: यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.58.6 
वितस्थे सोऽन्तरिक्षे च हृदयेन विदूयता।
यथा तिष्ठति वै कश्चित् खं च गां चान्तरा नर:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् तक्षक दुःखी हृदय से आकाश में उसी प्रकार स्थिर खड़ा रहा, जैसे कोई मनुष्य आकाश और पृथ्वी के बीच लटका रहता है।
 
Then Takshak, with a pained heart, stood still in the sky, just as a man is hanging between the sky and the earth.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)