शौनक उवाच
किं सूत तेषां विप्राणां मन्त्रग्रामो मनीषिणाम्।
न प्रत्यभात् तदाग्नौ यत् स पपात न तक्षक:॥ ४॥
अनुवाद
शौनकजी ने पूछा - सूत! उस यज्ञ में बहुत से बुद्धिमान ब्राह्मण उपस्थित थे। क्या उन्होंने ऐसे मन्त्रों का विचार नहीं किया था जिनसे तक्षक शीघ्र ही अग्नि में गिर जाए? ऐसा क्या कारण था कि तक्षक अग्निकुण्ड में नहीं गिरा?॥4॥
Shaunakji asked - Suta! Many wise Brahmins were present in that yagya. Did they not think of such mantras by which Takshak would fall in the fire quickly? What was the reason that Takshak did not fall in the fire pit?॥ 4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥