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mahabharat 1.58.4: शौनकजी ने पूछा - सूत! उस यज्ञ में बहुत से बुद्धिमान ब्राह्मण उपस्थित थे। क्या उन्होंने ऐसे मन्त्रों का विचार नहीं किया था जिनसे तक्षक शीघ्र ही अग्नि में गिर जाए? ऐसा क्या कारण था कि तक्षक अग्निकुण्ड में नहीं गिरा?॥4॥   |   mahabharat अध्याय 1.58: यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 58: यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.58.4 
शौनक उवाच
किं सूत तेषां विप्राणां मन्त्रग्रामो मनीषिणाम्।
न प्रत्यभात् तदाग्नौ यत् स पपात न तक्षक:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
शौनकजी ने पूछा - सूत! उस यज्ञ में बहुत से बुद्धिमान ब्राह्मण उपस्थित थे। क्या उन्होंने ऐसे मन्त्रों का विचार नहीं किया था जिनसे तक्षक शीघ्र ही अग्नि में गिर जाए? ऐसा क्या कारण था कि तक्षक अग्निकुण्ड में नहीं गिरा?॥4॥
 
Shaunakji asked - Suta! Many wise Brahmins were present in that yagya. Did they not think of such mantras by which Takshak would fall in the fire quickly? What was the reason that Takshak did not fall in the fire pit?॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)