Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.58.1-2: उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनक! मैंने आस्तीक के विषय में एक और आश्चर्यजनक बात सुनी है कि जब राजा जनमेजय ने उनसे पूर्वोक्त प्रकार से वर मांगने के लिए कहा और उनके वर मांगने पर इन्द्र के हाथ से छूटकर तक्षक नाग आकाश में ही रुक गया, तब राजा जनमेजय को बड़ी चिंता हुई ॥1-2॥ | mahabharat अध्याय 1.58: यज्ञकी समाप्ति एवं आस्तीकका सर्पोंसे वर प्राप्त करना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
सौतिरुवाच
इदमत्यद्भुतं चान्यदास्तीकस्यानुशुश्रुम।
तथा वरैश्छन्द्यमाने राज्ञा पारिक्षितेन हि॥ १॥
इन्द्रहस्ताच्च्युतो नाग: ख एव यदतिष्ठत।
ततश्चिन्तापरो राजा बभूव जनमेजय:॥ २॥
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनक! मैंने आस्तीक के विषय में एक और आश्चर्यजनक बात सुनी है कि जब राजा जनमेजय ने उनसे पूर्वोक्त प्रकार से वर मांगने के लिए कहा और उनके वर मांगने पर इन्द्र के हाथ से छूटकर तक्षक नाग आकाश में ही रुक गया, तब राजा जनमेजय को बड़ी चिंता हुई ॥1-2॥
Ugrasravaji says - Shaunak! I have heard another amazing thing about Astika that when King Janmejaya requested him to ask for a boon in the aforesaid manner and on his asking for the boon, Takshak snake that had fallen from Indra's hand stopped in the sky, then King Janmejaya became very worried. ॥1-2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥