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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 57: सर्पयज्ञमें दग्ध हुए प्रधान-प्रधान सर्पोंके नाम  »  श्लोक 8-10
 
 
श्लोक  1.57.8-10 
तक्षकस्य कुले जातान् प्रवक्ष्यामि निबोध तान्।
पुच्छाण्डको मण्डलक: पिण्डसेक्ता रभेणक:॥ ८॥
उच्छिख: शरभो भङ्गो बिल्वतेजा विरोहण:।
शिली शलकरो मूक: सुकुमार: प्रवेपन:॥ ९॥
मुद्‍गर: शिशुरोमा च सुरोमा च महाहनु:।
एते तक्षकजा नागा: प्रविष्टा हव्यवाहनम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
अब मैं तक्षक के वंश में उत्पन्न हुए नागों का वर्णन करूँगा, उनके नाम सुनो- पुच्छन्दक, माण्डलक, पिण्डसेक्त, रभेनक, उच्चिख, शरभ, भंग, बिल्वतेज, विरोहण, शिलि, शालकर, मूक, सुकुमार, प्रवेपन, मुद्गर, शिशुरोमा, सुरोमा तथा महाहनु - ये तक्षक के वंशज नाग थे, जो सर्पसत्र की अग्नि में भस्म हो गये। 8-10॥
 
Now I will describe the snakes born in Takshak's clan, listen to their names - Puchhandak, Mandalak, Pindsekta, Rabhenak, Uchchikh, Sharabh, Bhang, Bilvateja, Virohan, Shili, Shalkar, Mook, Sukumar, Pravepan, Mudgar, Shishuroma, Suroma and Mahahanu - these were the snakes descended from Takshak, who perished in the fire of Sarpasatra. 8-10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)