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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 57: सर्पयज्ञमें दग्ध हुए प्रधान-प्रधान सर्पोंके नाम  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.57.2 
सौतिरुवाच
सहस्राणि बहून्यस्मिन् प्रयुतान्यर्बुदानि च।
न शक्यं परिसंख्यातुं बहुत्वाद् द्विजसत्तम॥ २॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी बोले - हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! इस यज्ञ में हजारों, लाखों और करोड़ों सर्प मारे गए। उनकी संख्या इतनी अधिक थी कि उनकी गणना नहीं की जा सकती॥ 2॥
 
Ugrasravaji said - O best of Brahmins! Thousands, lakhs and billions of serpents fell in this sacrifice. Their number was so large that they cannot be counted.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)