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mahabharat 1.56.7: 'राजन्! मैं यह पुराणों में यह जानकर कह रहा हूँ कि इन्द्र ने तक्षक को वरदान दिया है - 'सर्पराज! तुम मेरे पास सुरक्षित रहो। सर्प के विष की अग्नि तुम्हें नहीं जला सकेगी।'   |   mahabharat अध्याय 1.56: राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षक नागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 56: राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षक नागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.56.7 
पुराणमागम्य ततो ब्रवीम्यहं
दत्तं तस्मै वरमिन्द्रेण राजन्।
वसेह त्वं मत्सकाशे सुगुप्तो
न पावकस्त्वां प्रदहिष्यतीति॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'राजन्! मैं यह पुराणों में यह जानकर कह रहा हूँ कि इन्द्र ने तक्षक को वरदान दिया है - 'सर्पराज! तुम मेरे पास सुरक्षित रहो। सर्प के विष की अग्नि तुम्हें नहीं जला सकेगी।'
 
‘King! I am saying this after knowing the Puranas that Indra has given a boon to Takshak - 'King of snakes! You stay here safely near me. The fire of the snake's poison will not burn you.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)