श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 56: राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षक नागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.56.4 
जनमेजय उवाच
यथा चेदं कर्म समाप्यते मे
यथा च वै तक्षक एति शीघ्रम्।
तथा भवन्त: प्रयतन्तु सर्वे
परं शक्त्या स हि मे विद्विषाण:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय बोले - हे ब्राह्मणों! जिस प्रकार भी यह कार्य सम्पन्न हो और जिस प्रकार भी तक्षक नाग शीघ्रता से यहाँ आ जाए, तुम सब लोग पूरी शक्ति से वैसा ही करने का प्रयत्न करो; क्योंकि वही मेरा सच्चा शत्रु है॥ 4॥
 
Janamejaya said - O Brahmins! In whatever way this task is completed and in whatever way Takshak Naag comes here quickly, you all should try to do the same with all your might; because he is my real enemy.॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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