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श्लोक 1.56.4  |
जनमेजय उवाच
यथा चेदं कर्म समाप्यते मे
यथा च वै तक्षक एति शीघ्रम्।
तथा भवन्त: प्रयतन्तु सर्वे
परं शक्त्या स हि मे विद्विषाण:॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| जनमेजय बोले - हे ब्राह्मणों! जिस प्रकार भी यह कार्य सम्पन्न हो और जिस प्रकार भी तक्षक नाग शीघ्रता से यहाँ आ जाए, तुम सब लोग पूरी शक्ति से वैसा ही करने का प्रयत्न करो; क्योंकि वही मेरा सच्चा शत्रु है॥ 4॥ |
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| Janamejaya said - O Brahmins! In whatever way this task is completed and in whatever way Takshak Naag comes here quickly, you all should try to do the same with all your might; because he is my real enemy.॥ 4॥ |
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