श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 56: राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षक नागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.56.3 
सौतिरुवाच
व्याहर्तुकामे वरदे नृपे द्विजं
वरं वृणीष्वेति ततोऽभ्युवाच।
होता वाक्यं नातिहृष्टान्तरात्मा
कर्मण्यस्मिंस्तक्षको नैति तावत्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनक! तत्पश्चात वर देने के लिए तत्पर राजा जनमेजय ब्राह्मण आस्तिक से कहने ही वाले थे कि 'अपनी इच्छानुसार वर मांगो।' उसी समय होता नामक ऋषि ने, जिसका मन बहुत प्रसन्न नहीं था, कहा - 'तक्षक नाग अभी तक हमारे इस यज्ञ में नहीं आया है।'
 
Ugrasravaji says - Shaunak! Thereafter King Janamejaya, who was ready to grant a boon, was about to say to the Brahmin Aastik that 'Ask for a boon of your choice.' At that very moment Hota, whose mind was not very happy, said - 'Takshaka snake has not yet come to this yagya of ours.' 3.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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