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mahabharat 1.56.25-26: उग्रश्रवाजी कहते हैं - भृगुनन्दन शौनक ! जब आस्तीक ने ऐसा कहा, तब उस समय श्रेष्ठ वक्ता राजा जनमेजय ने उनसे बार-बार अनुरोध किया - ‘विप्रशिरोमणे ! आपका कल्याण हो, कोई अन्य वर मांग लीजिए ।’ परंतु आस्तीक ने कोई अन्य वर नहीं मांगा ॥25-26॥   |   mahabharat अध्याय 1.56: राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षक नागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 56: राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षक नागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  1.56.25-26 
सौतिरुवाच
आस्तीकेनैवमुक्तस्तु राजा पारिक्षितस्तदा।
पुन: पुनरुवाचेदमास्तीकं वदतां वर:॥ २५॥
अन्यं वरय भद्रं ते वरं द्विजवरोत्तम।
अयाचत न चाप्यन्यं वरं स भृगुनन्दन॥ २६॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - भृगुनन्दन शौनक ! जब आस्तीक ने ऐसा कहा, तब उस समय श्रेष्ठ वक्ता राजा जनमेजय ने उनसे बार-बार अनुरोध किया - ‘विप्रशिरोमणे ! आपका कल्याण हो, कोई अन्य वर मांग लीजिए ।’ परंतु आस्तीक ने कोई अन्य वर नहीं मांगा ॥25-26॥
 
Ugrashravaji says – Bhrigunandan Shaunak! When Astika said this, King Janamejaya, the best speaker at that time, requested him again and again - 'Viprashiromane! May you be well, ask for some other boon.' But Astik did not ask for any other boon. 25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)