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mahabharat 1.56.20: उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनक! सर्पराज तक्षक कुछ ही क्षणों में अग्नि की लपटों में गिरने वाला था। उस समय आस्तिक ने 'वर मांगने का यह अच्छा अवसर है' यह सोचकर राजा को वर देने के लिए प्रेरित किया।   |   mahabharat अध्याय 1.56: राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षक नागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  1.56.20 
सौतिरुवाच
पतिष्यमाणे नागेन्द्रे तक्षके जातवेदसि।
इदमन्तरमित्येव तदाऽऽस्तीकोऽभ्यचोदयत्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनक! सर्पराज तक्षक कुछ ही क्षणों में अग्नि की लपटों में गिरने वाला था। उस समय आस्तिक ने 'वर मांगने का यह अच्छा अवसर है' यह सोचकर राजा को वर देने के लिए प्रेरित किया।
 
Ugrashravaji says - Shaunak! King of snakes Takshak was about to fall in the flames in a few moments. At that time Aastik, thinking that 'this is a good opportunity to ask for a boon', inspired the king to grant the boon.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)