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mahabharat 1.56.10: तक्षक सर्प उनके दुपट्टे में छिपा हुआ था। भय से व्याकुल होने के कारण तक्षक को क्षण भर भी शांति नहीं मिल रही थी। इधर, तक्षक का नाश करने की इच्छा से राजा जनमेजय क्रोधित होकर पुनः मन्त्र जानने वाले ब्राह्मणों से बोले।   |   mahabharat अध्याय 1.56: राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षक नागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 56: राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षक नागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.56.10 
तस्योत्तरीये निहित: स नागो
भयोद्विग्न: शर्म नैवाभ्यगच्छत् ।
ततो राजा मन्त्रविदोऽब्रवीत् पुन:
क्रुद्धो वाक्यं तक्षकस्यान्तमिच्छन्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
तक्षक सर्प उनके दुपट्टे में छिपा हुआ था। भय से व्याकुल होने के कारण तक्षक को क्षण भर भी शांति नहीं मिल रही थी। इधर, तक्षक का नाश करने की इच्छा से राजा जनमेजय क्रोधित होकर पुनः मन्त्र जानने वाले ब्राह्मणों से बोले।
 
Takshak snake was hidden in his upper garment (dupatta). Takshak was not able to find peace even for a moment due to being disturbed with fear. Here King Janamejaya, wanting to destroy Takshak, became angry and again spoke to the Brahmins who knew mantras.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)