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mahabharat 1.55.3: जनमेजय! जिस प्रकार यमराज का यज्ञ, हरिमेध का यज्ञ तथा राजा रन्तिदेव का यज्ञ उत्तम गुणों से युक्त था, उसी प्रकार आपका यह यज्ञ भी उत्तम गुणों से युक्त है। हमारे प्रियजनों का कल्याण हो। 3॥   |   mahabharat अध्याय 1.55: आस्तीकके द्वारा यजमान, यज्ञ, ऋत्विज्, सदस्यगण और अग्निदेवकी स्तुति-प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 55: आस्तीकके द्वारा यजमान, यज्ञ, ऋत्विज्, सदस्यगण और अग्निदेवकी स्तुति-प्रशंसा  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.55.3 
यमस्य यज्ञो हरिमेधसश्च
यथा यज्ञो रन्तिदेवस्य राज्ञ:।
तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्रॺ
पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्य:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय! जिस प्रकार यमराज का यज्ञ, हरिमेध का यज्ञ तथा राजा रन्तिदेव का यज्ञ उत्तम गुणों से युक्त था, उसी प्रकार आपका यह यज्ञ भी उत्तम गुणों से युक्त है। हमारे प्रियजनों का कल्याण हो। 3॥
 
Janamejaya! Just as Yamraj's Yagya, Harimedha's Yagya and King Rantidev's Yagya were full of noble qualities, similarly this Yagya of yours is full of good qualities. May our loved ones be well. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)