Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.55.17: उग्रश्रवाजी कहते हैं - आस्तिक द्वारा इस प्रकार स्तुति करने पर यजमान राजा जनमेजय, सभासद, ऋत्विज् और अग्निदेव सभी अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन सबके भावों और बाह्य कर्मों को लक्ष्य करके राजा जनमेजय ने इस प्रकार कहा॥17॥ | mahabharat अध्याय 1.55: आस्तीकके द्वारा यजमान, यज्ञ, ऋत्विज्, सदस्यगण और अग्निदेवकी स्तुति-प्रशंसा । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
सौतिरुवाच
एवं स्तुता: सर्व एव प्रसन्ना
राजा सदस्या ऋत्विजो हव्यवाह:।
तेषां दृष्ट्वा भावितानीङ्गितानि
प्रोवाच राजा जनमेजयोऽथ॥ १७॥
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - आस्तिक द्वारा इस प्रकार स्तुति करने पर यजमान राजा जनमेजय, सभासद, ऋत्विज् और अग्निदेव सभी अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन सबके भावों और बाह्य कर्मों को लक्ष्य करके राजा जनमेजय ने इस प्रकार कहा॥17॥
Ugrashravaji says - The host king Janamejaya, the members, Ritvij and Agnidev all became very happy after Aastik praised him in this way. Taking aim at the feelings and external actions of all of them, King Janamejaya spoke thus. 17॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे आस्तीककृतराजस्तवे पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें आस्तीकद्वारा सर्पसत्रमें राजा जनमेजयकी
स्तुतिविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥