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mahabharat 1.55.12: हे पुरुषों में श्रेष्ठ जनमेजय! जिस प्रकार साक्षात् वज्ररूपी इन्द्र समस्त लोकों की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप भी इस लोक में हम लोगों के रक्षक माने गए हैं। आपके अतिरिक्त संसार में आपके समान कोई दूसरा रक्षक नहीं है। 12॥   |   mahabharat अध्याय 1.55: आस्तीकके द्वारा यजमान, यज्ञ, ऋत्विज्, सदस्यगण और अग्निदेवकी स्तुति-प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 55: आस्तीकके द्वारा यजमान, यज्ञ, ऋत्विज्, सदस्यगण और अग्निदेवकी स्तुति-प्रशंसा  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.55.12 
शक्र: साक्षाद् वज्रपाणिर्यथेह
त्राता लोकेऽस्मिंस्त्वं तथेह प्रजानाम्।
मतस्त्वं न: पुरुषेन्द्रेह लोके
न च त्वदन्यो भूपतिरस्ति जज्ञे॥ १२॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषों में श्रेष्ठ जनमेजय! जिस प्रकार साक्षात् वज्ररूपी इन्द्र समस्त लोकों की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप भी इस लोक में हम लोगों के रक्षक माने गए हैं। आपके अतिरिक्त संसार में आपके समान कोई दूसरा रक्षक नहीं है। 12॥
 
Janamejaya, the best among men! Just as Indra, the real thunderbolt, protects all the people, in the same way, you too have been considered the guardian of us in this world. Apart from you, there is no other guardian like you in the world. 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)