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mahabharat 1.55.10: जो अग्निदेव विभावसु, चित्रभानु, महात्मा, हिरण्यरेता, हविष्यभोजी और कृष्णवर्त्म कहलाते हैं, वे आपके इस यज्ञ में दक्षिणावर्त दिशा में प्रज्वलित मशालों से आहुतियों को अर्पित करके आपके इस हविष्य की सदैव कामना करते हैं ॥10॥   |   mahabharat अध्याय 1.55: आस्तीकके द्वारा यजमान, यज्ञ, ऋत्विज्, सदस्यगण और अग्निदेवकी स्तुति-प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 55: आस्तीकके द्वारा यजमान, यज्ञ, ऋत्विज्, सदस्यगण और अग्निदेवकी स्तुति-प्रशंसा  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.55.10 
विभावसुश्चित्रभानुर्महात्मा
हिरण्यरेता हुतभुक् कृष्णवर्त्मा।
प्रदक्षिणावर्तशिख: प्रदीप्तो
हव्यं तवेदं हुतभुग् वष्टि देव:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जो अग्निदेव विभावसु, चित्रभानु, महात्मा, हिरण्यरेता, हविष्यभोजी और कृष्णवर्त्म कहलाते हैं, वे आपके इस यज्ञ में दक्षिणावर्त दिशा में प्रज्वलित मशालों से आहुतियों को अर्पित करके आपके इस हविष्य की सदैव कामना करते हैं ॥10॥
 
Those Agnidevs who are called Vibhavasu, Chitrabhanu, Mahatma, Hiranyareta, Havishyabhoji and Krishnavartma, in this yagya of yours, they always desire this havishya of yours by offering them to the oblations that have been lit with the torches in a clockwise direction. 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)