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mahabharat 1.54.4: उग्रश्रवाजी कहते हैं - तत्पश्चात नागराज की बहन जरत्कारु ने, जो अपने भाइयों का हित चाहती थी, आस्तिक से कहा, वह शान्त हो॥4॥   |   mahabharat अध्याय 1.54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.54.4 
सौतिरुवाच
तत आचष्ट सा तस्मै बान्धवानां हितैषिणी।
भगिनी नागराजस्य जरत्कारुरविक्लवा॥ ४॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - तत्पश्चात नागराज की बहन जरत्कारु ने, जो अपने भाइयों का हित चाहती थी, आस्तिक से कहा, वह शान्त हो॥4॥
 
Ugrashravaji says - Thereafter, Jaratkaru, the sister of the king of Nagas, who wanted the welfare of her brothers, said to the believer, may he be peaceful. 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)