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mahabharat 1.54.29: जब श्रेष्ठ आस्तिक द्विज यज्ञमंडप में प्रवेश करने लगे, तो द्वारपालों ने उन्हें रोक दिया। तब काम, क्रोध आदि शत्रुओं को तृप्त करने के लिए उसमें प्रवेश करने की इच्छा रखने वाले आस्तिकगण उस यज्ञ की स्तुति करने लगे। 29॥   |   mahabharat अध्याय 1.54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  1.54.29 
स तत्र वारितो द्वा:स्थै: प्रविशन् द्विजसत्तम:।
अभितुष्टाव तं यज्ञं प्रवेशार्थी परंतप:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
जब श्रेष्ठ आस्तिक द्विज यज्ञमंडप में प्रवेश करने लगे, तो द्वारपालों ने उन्हें रोक दिया। तब काम, क्रोध आदि शत्रुओं को तृप्त करने के लिए उसमें प्रवेश करने की इच्छा रखने वाले आस्तिकगण उस यज्ञ की स्तुति करने लगे। 29॥
 
When Dwija, the best believer, started entering the Yajnamandap, the gatekeepers stopped him. Then the believers, desirous of entering into it to satisfy the enemies like lust, anger etc., started praising that Yagya. 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)