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mahabharat 1.54.28: वहाँ पहुँचकर आस्तिक ने अत्यन्त सुन्दर यज्ञमण्डप देखा, जो सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी अनेक मण्डलों से परिपूर्ण था ॥28॥   |   mahabharat अध्याय 1.54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  1.54.28 
स गत्वापश्यदास्तीको यज्ञायतनमुत्तमम्।
वृतं सदस्यैर्बहुभि: सूर्यवह्निसमप्रभै:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वहाँ पहुँचकर आस्तिक ने अत्यन्त सुन्दर यज्ञमण्डप देखा, जो सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी अनेक मण्डलों से परिपूर्ण था ॥28॥
 
After reaching there, the believer saw the most beautiful Yajnamandapam, which was filled with many members as bright as the sun and fire. 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)