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mahabharat 1.54.26-27: उग्रश्रवाजी कहते हैं - तत्पश्चात नागराज वासुकि के भयंकर चिन्ता-ज्वर को दूर करके तथा उसे अपने ऊपर लेकर, श्रेष्ठ आस्तिक द्विज बड़ी शीघ्रता से समस्त उत्तम गुणों से सम्पन्न राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ में नागराज वासुकि आदि को प्राण संकट से बचाने के लिए गए ॥26-27॥   |   mahabharat अध्याय 1.54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  1.54.26-27 
सौतिरुवाच
तत: स वासुकेर्घोरमपनीय मनोज्वरम्।
आधाय चात्मनोऽङ्गेषु जगाम त्वरितो भृशम्॥ २६॥
जनमेजयस्य तं यज्ञं सर्वै: समुदितं गुणै:।
मोक्षाय भुजगेन्द्राणामास्तीको द्विजसत्तम:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - तत्पश्चात नागराज वासुकि के भयंकर चिन्ता-ज्वर को दूर करके तथा उसे अपने ऊपर लेकर, श्रेष्ठ आस्तिक द्विज बड़ी शीघ्रता से समस्त उत्तम गुणों से सम्पन्न राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ में नागराज वासुकि आदि को प्राण संकट से बचाने के लिए गए ॥26-27॥
 
Ugrashravaji says - After that, after removing the terrible anxiety-fever of Nagraj Vasuki and taking him upon himself, Dwija, the best believer, with great haste went to the serpent sacrifice of King Janamejaya, who was full of all the best qualities, to save Nagraj Vasuki etc. from the danger of life. 26-27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)