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mahabharat 1.54.23: वासुकि बोले - आस्तिक! ब्रह्मा के दण्डस्वरूप माता के शाप के कारण मुझे चक्कर आ रहा है। मेरा हृदय विदीर्ण हो रहा है और मैं दिशाओं को पहचान नहीं पा रहा हूँ।   |   mahabharat अध्याय 1.54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  1.54.23 
वासुकिरुवाच
आस्तीक परिघूर्णामि हृदयं मे विदीर्यते।
दिशो न प्रतिजानामि ब्रह्मदण्डनिपीडित:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
वासुकि बोले - आस्तिक! ब्रह्मा के दण्डस्वरूप माता के शाप के कारण मुझे चक्कर आ रहा है। मेरा हृदय विदीर्ण हो रहा है और मैं दिशाओं को पहचान नहीं पा रहा हूँ।
 
Vasuki said - Aastik! I am feeling dizzy due to the curse of my mother in the form of Brahma's punishment. My heart is being torn apart and I am unable to recognise directions.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)