Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.54.20-21: 'मैंने कभी विनोद में भी झूठ नहीं बोला, फिर इस संकटकाल में कैसे कह सकता हूँ । हे पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ चाचा ! आज मैं सर्पयज्ञ के लिए दीक्षित हुए महाबली राजा जनमेजय के पास जाऊँगा और अपने शुभ वचनों से उन्हें इस प्रकार संतुष्ट करूँगा कि राजा का यज्ञ रुक जाएगा ।॥ 20-21॥ | mahabharat अध्याय 1.54: माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न मे वागनृतं प्राह स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा।
तं वै नृपवरं गत्वा दीक्षितं जनमेजयम्॥ २०॥
वाग्भिर्मङ्गलयुक्ताभिस्तोषयिष्येऽद्य मातुल।
यथा स यज्ञो नृपतेर्निवर्तिष्यति सत्तम॥ २१॥
अनुवाद
'मैंने कभी विनोद में भी झूठ नहीं बोला, फिर इस संकटकाल में कैसे कह सकता हूँ । हे पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ चाचा ! आज मैं सर्पयज्ञ के लिए दीक्षित हुए महाबली राजा जनमेजय के पास जाऊँगा और अपने शुभ वचनों से उन्हें इस प्रकार संतुष्ट करूँगा कि राजा का यज्ञ रुक जाएगा ।॥ 20-21॥
'I have never spoken a lie even in jest, then how can I say it in this time of crisis. O uncle, the best among the virtuous men! Today I will go to the great king Janamejaya, who has been initiated for the snake sacrifice, and with my auspicious words I will satisfy him in such a way that the king's sacrifice will be stopped.॥ 20-21॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥