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mahabharat 1.53.23: 'जनमेजय का वह यज्ञ हमारा अनिष्ट करने के लिए ही किया जा रहा है। अब तो मुझे भी अवश्य ही यमलोक जाना पड़ेगा।॥ 23॥   |   mahabharat अध्याय 1.53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  1.53.23 
पारिक्षितस्य यज्ञोऽसौ वर्ततेऽस्मज्जिघांसया।
व्यक्तं मयापि गन्तव्यं प्रेतराजनिवेशनम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
'जनमेजय का वह यज्ञ हमारा अनिष्ट करने के लिए ही किया जा रहा है। अब तो मुझे भी अवश्य ही यमलोक जाना पड़ेगा।॥ 23॥
 
'That sacrifice of Janamejaya is being done only to harm us. Surely now I too will have to go to Yamaloka.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)