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mahabharat 1.53.20: नागों में श्रेष्ठ वासुकि को भयंकर मोह उत्पन्न हो गया और उनका हृदय घूमने लगा। तब उन्होंने अपनी बहन से इस प्रकार कहा -॥20॥   |   mahabharat अध्याय 1.53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  1.53.20 
कश्मलं चाविशद् घोरं वासुकिं पन्नगोत्तमम्।
स घूर्णमानहृदयो भगिनीमिदमब्रवीत्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
नागों में श्रेष्ठ वासुकि को भयंकर मोह उत्पन्न हो गया और उनका हृदय घूमने लगा। तब उन्होंने अपनी बहन से इस प्रकार कहा -॥20॥
 
Vasuki, the best of the serpents, was overcome with a terrible delusion, and his heart began to spin. So he spoke to his sister thus -॥20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)