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mahabharat 1.53.2: उस अत्यन्त भयंकर सर्पजाल के सदस्य कौन-से ऋषि थे, जो सर्पों के लिए अत्यन्त भयावह और कष्टदायक था?॥2॥   |   mahabharat अध्याय 1.53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.53.2 
के सदस्या बभूवुश्च सर्पसत्रे सुदारुणे।
विषादजननेऽत्यर्थं पन्नगानां महाभये॥ २॥
 
 
अनुवाद
उस अत्यन्त भयंकर सर्पजाल के सदस्य कौन-से ऋषि थे, जो सर्पों के लिए अत्यन्त भयावह और कष्टदायक था?॥2॥
 
Which sages were members of that extremely fearful serpent trap, which was very frightening and distressing for the snakes?॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)