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mahabharat 1.53.19: उस यज्ञ की अग्नि में निरन्तर सर्पों की आहुति दी जा रही थी। अब केवल कुछ ही सर्प शेष रह गए थे। यह देखकर वासुकि नाग बहुत दुःखी हुए और हृदय में व्यथित होने लगे॥19॥   |   mahabharat अध्याय 1.53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.53.19 
अजस्रं निपतत्स्वग्नौ नागेषु भृशदु:खित:।
अल्पशेषपरीवारो वासुकि: पर्यतप्यत॥ १९॥
 
 
अनुवाद
उस यज्ञ की अग्नि में निरन्तर सर्पों की आहुति दी जा रही थी। अब केवल कुछ ही सर्प शेष रह गए थे। यह देखकर वासुकि नाग बहुत दुःखी हुए और हृदय में व्यथित होने लगे॥19॥
 
Snakes were continuously being sacrificed in the fire of that yagya. Now only a small number of snakes were left. Seeing this, Vasuki snake became very sad and started feeling distressed in his heart.॥19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)