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mahabharat 1.53.17: मैंने तुम्हारे लिए पितामह ब्रह्माजी को पहले ही प्रसन्न कर लिया है, इसलिए तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं है। तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिए।॥17॥   |   mahabharat अध्याय 1.53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.53.17 
प्रसादितो मया पूर्वं तवार्थाय पितामह:।
तस्मात् तव भयं नास्ति व्येतु ते मानसो ज्वर:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
मैंने तुम्हारे लिए पितामह ब्रह्माजी को पहले ही प्रसन्न कर लिया है, इसलिए तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं है। तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिए।॥17॥
 
I have already pleased the grandfather Brahmaji for you, so you need not fear anything. Your mental anxiety should go away.'॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)