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mahabharat 1.53.16: तब इन्द्र ने प्रसन्न होकर कहा, 'सर्पराज तक्षक! तुम्हें इस सर्पयज्ञ से कोई भय नहीं है।'   |   mahabharat अध्याय 1.53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.53.16 
तमिन्द्र: प्राह सुप्रीतो न तवास्तीह तक्षक।
भयं नागेन्द्र तस्माद् वै सर्पसत्रात् कदाचन॥ १६॥
 
 
अनुवाद
तब इन्द्र ने प्रसन्न होकर कहा, 'सर्पराज तक्षक! तुम्हें इस सर्पयज्ञ से कोई भय नहीं है।'
 
Then Indra became very pleased and said, 'King of Snakes Takshak! You have no fear of this snake sacrifice here.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)