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mahabharat 1.53.15: वहाँ उसने विस्तारपूर्वक सब कुछ कह सुनाया। तब सर्पश्रेष्ठ तक्षक ने अपराध करने के भय से भगवान इन्द्र की शरण ली।   |   mahabharat अध्याय 1.53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.53.15 
तत: सर्वं यथावृत्तमाख्याय भुजगोत्तम:।
अगच्छच्छरणं भीत आग: कृत्वा पुरन्दरम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
वहाँ उसने विस्तारपूर्वक सब कुछ कह सुनाया। तब सर्पश्रेष्ठ तक्षक ने अपराध करने के भय से भगवान इन्द्र की शरण ली।
 
There he narrated everything in detail. Then Takshak, the best of the snakes, being afraid of committing a crime, took refuge in Lord Indra. 15.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)