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mahabharat 1.53.14: जब सर्पराज तक्षक ने सुना कि राजा जनमेजय ने सर्पयज्ञ में दीक्षा ले ली है, तब वह तुरन्त ही देवराज इन्द्र के महल में गया॥14॥   |   mahabharat अध्याय 1.53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.53.14 
तक्षकस्तु स नागेन्द्र: पुरन्दरनिवेशनम्।
गत: श्रुत्वैव राजानं दीक्षितं जनमेजयम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जब सर्पराज तक्षक ने सुना कि राजा जनमेजय ने सर्पयज्ञ में दीक्षा ले ली है, तब वह तुरन्त ही देवराज इन्द्र के महल में गया॥14॥
 
When King Takshaka of Serpents heard that King Janamejaya has taken initiation in the snake sacrifice, he immediately went to the palace of King of Devas Indra.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)