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mahabharat 1.53.12: सर्पों की चर्बी और चर्बी से भरी हुई बहुत सी धाराएँ बह निकलीं। निरन्तर जलते हुए सर्पों की तीखी दुर्गन्ध चारों ओर फैल रही थी।॥12॥   |   mahabharat अध्याय 1.53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.53.12 
वसामेदोवहा: कुल्या नागानां सम्प्रवर्तिता:।
ववौ गन्धश्च तुमुलो दह्यतामनिशं तदा॥ १२॥
 
 
अनुवाद
सर्पों की चर्बी और चर्बी से भरी हुई बहुत सी धाराएँ बह निकलीं। निरन्तर जलते हुए सर्पों की तीखी दुर्गन्ध चारों ओर फैल रही थी।॥12॥
 
Many streams filled with the fat and blubber of the serpents flowed out. The pungent stench of the constantly burning serpents was spreading all around.॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)