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mahabharat 1.53.11: उस समय ऋत्विज लोग उस महान् यज्ञसर्पसत्र में आहुति देते थे, तो प्रत्येक प्राणी को भय देने वाले भयंकर सर्प वहाँ आकर गिरते रहते थे॥11॥   |   mahabharat अध्याय 1.53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 53: सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.53.11 
जुह्वत्स्वृत्विक्ष्वथ तदा सर्पसत्रे महाक्रतौ।
अहय: प्रापतंस्तत्र घोरा: प्राणिभयावहा:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
उस समय ऋत्विज लोग उस महान् यज्ञसर्पसत्र में आहुति देते थे, तो प्रत्येक प्राणी को भय देने वाले भयंकर सर्प वहाँ आकर गिरते रहते थे॥11॥
 
At that time, as the people of Ritvij used to offer sacrifices in that great Yagya Sarpasatra, the fierce snakes that gave fear to every living being kept coming and falling there. 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)