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mahabharat 1.52.4: तत्पश्चात् वे सर्प जलती हुई अग्नि में गिरकर पीड़ा से तड़पने लगे और करुण स्वर में एक दूसरे को पुकारने लगे॥4॥   |   mahabharat अध्याय 1.52: सर्पसत्रका आरम्भ और उसमें सर्पोंका विनाश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 52: सर्पसत्रका आरम्भ और उसमें सर्पोंका विनाश  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.52.4 
तत: सर्पा: समापेतु: प्रदीप्ते हव्यवाहने।
विचेष्टमाना: कृपणमाह्वयन्त: परस्परम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वे सर्प जलती हुई अग्नि में गिरकर पीड़ा से तड़पने लगे और करुण स्वर में एक दूसरे को पुकारने लगे॥4॥
 
After that, the snakes started falling into the burning fire, writhing in agony and calling each other in pitiful voices. 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)